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श्रीघटिकाचलहनुमत्स्तोत्रम्

 ।। श्रीघटिकाचलहनुमत्स्तोत्रम् ।।


ब्रह्माण्डपुराणतः स्तोत्रं

अतिपाटलवक्त्राब्जं धृतहेमाद्रिविग्रहम्।

आञ्जनेयं शङ्खचक्रपाणिं चेतसि धीमहि।।


श्रीयोगपीठविन्यस्तव्यत्यस्तचरणाम्बुजम्।

दरार्यभयमुद्राक्षमालापट्टिकया युतम्।।


पारिजाततरोर्मूलवासिनं वनवासिनम्।

पश्चिमाभिमुखं बालं नृहरेर्ध्यानसंस्थितम्।।


सर्वाभीष्टप्रदं नॄणां हनुमन्तमुपास्महे।


नारद उवाच

स्थानानामुत्तमं स्थानं किं स्थानं वद मे पितः।

ब्रह्मोवाच

ब्रह्मन् पुरा विवादोऽभून्नारायणकपीशयोः।।


तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि सावधानमनाः श‍ृणु।

एकमासाद्वरदः साक्षात् द्विमासाद्रङ्गनायकः।।


मासार्धेन प्रवक्ष्यमि तथा वै वेङ्कटेश्वरः।

अर्धमासेन दास्यामि कृतं तु परमं शिवम्।।


घटिकाचलसंस्थानाद्धटिकाचलवल्लभः।

हनुमानञ्जनासूनू रामभक्तो जितेन्द्रियः।।


घटिकादेव काम्यानां कामदाता भवाम्यहम्।

शङ्खचक्रप्रदो येन प्रदास्यामि हरेः पदम्।।


घटिकाचलसंस्थाने घटिकां वसते यदि।

स मुक्तः सर्वलोकेषु वायुपुत्रप्रसादतः।।


ब्रह्मतीर्थस्य निकटे राघवेन्द्रस्य सन्निधौ।

वायुपुत्रं समालोक्य न भयं विद्यते नरे।।


तस्माद्वायुसुतस्थानं पवित्रमतिदुलर्भम्।

पूर्वाब्धेः पश्चिमे भागे दक्षिणाब्धेस्तथोत्तरे।।


वेङ्कटाद्दक्षिणे भागे पर्वते घटिकाचले।

तत्रैव ऋषयः सर्वे तपस्तप्यन्ति सादरम्।।


पञ्चाक्षरमहामन्त्रं द्विषट्कं च द्विजातिनाम्।

नाममन्त्रं ततः श्रीमन् स्त्रीशूद्राणामुदाहृतम्।।


तत्र स्नात्वा ब्रह्मतीर्थे नत्वा तं वायुमन्दिरे।

वायुपुत्रं भजेन्नित्यं सर्वारिष्टविवर्जितः।।


सेवते मण्डलं नित्यं तथा वै ह्यर्धमण्डलम्।

वाञ्छितं विन्दते नित्यं वायुपुत्रप्रसादतः।।


तस्मात्त्वमपि भोः पुत्र निवासं घटिकाचले।।


नारद उवाच

कथं वासः प्रकर्तव्यो घटिकाचलमस्तके।

केन मन्त्रेण बलवानाञ्जनेयः प्रसीदति।।


विधानं तस्य मन्त्रस्य होमं चैव विशेषतः।

कियत्कालं तत्र वासं कर्तव्यं तन्ममावद।।


ब्रह्मोवाच

ब्रह्मतीर्थे ततः स्नत्वा हनुमत्संमुखे स्थितः।

द्वादशाक्षरमन्त्रं तु नित्यमष्टसहस्रकम्।।


जपेन्नियमतः शुद्धस्तद्भक्तस्तु परायणः।

निराहारः फलाहारो ब्रह्मचर्यव्रते स्थितः।।


मण्डलं तत्र वस्तव्यं भक्तियुक्तेन चेतसा।

ध्यानश्लोकं प्रवक्ष्यामि श‍ृणु नारद तत्वतः।।


तमञ्जनानन्दनमिन्दुबिम्बनिभाननं सुन्दरमप्रमेयम्।

सीतासुतं सूक्ष्मगुणस्वदेहं श्रीरामपादार्पणचित्तवृत्तिम्।।


एवं ध्यात्वा सदा भक्त्या तत्पादजलजं मुदा।

चतुर्थांशेन होमं वा कर्तव्यं पायसेन च।।


विधिना विधियुक्तस्तु विदित्वा घटिकाचलम्।

जगाम जयमन्विच्छन्निन्द्रियाणां महामनाः।।


एवं नियमयुक्तः सन् यः करोति हरेः प्रियम्।

विजयं विन्दते देही वायुपुत्रप्रसादतः।।


।। इति ब्रह्माण्डपुराणतः श्रीघटिकाचलहनुमत्स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

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