प्रस्तावना: क्या बिना तोड़-फोड़ के वास्तु सुधार संभव है? क्या आपका मकान पहले से बना हुआ है और उसमें कोई गंभीर वास्तु दोष है? अधिकांश लोग यह मानकर बैठ जाते हैं कि जब तक घर की दीवारों को गिराया नहीं जाएगा या लाखों रुपए खर्च करके पुनर्निर्माण नहीं किया जाएगा, तब तक वास्तु दोषों का निवारण असंभव है। लेकिन यह एक बहुत बड़ा भ्रम है। प्राचीन सनातन ग्रंथों और शिल्प शास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार, बना-बनाया मकान तोड़ने से न केवल आर्थिक नुकसान होता है, बल्कि मानसिक क्लेश भी बढ़ता है। प्रामाणिक वास्तु विज्ञान के अनुसार, बिना एक भी ईंट तोड़े और बिना भारी-भरकम खर्च किए भी घर के ऊर्जा क्षेत्र (Energy Field) को पूरी तरह संतुलित किया जा सकता है। जिस तरह एक योग्य चिकित्सक शरीर के किसी अंग में खराबी आने पर पूरे शरीर को नष्ट नहीं करता, बल्कि औषधियों और उचित उपचार से उसे दोबारा स्वस्थ बनाता है, ठीक उसी प्रकार वास्तु शास्त्र के 'प्रतिकार' (Remedies) सिद्धांतों के माध्यम से हम अपने घर की नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में बदल सकते हैं। दिशाएं अपने आप में कभी बुरी नहीं होतीं, बल्कि उन दिशाओं में...
।। श्री गणेश चालीसा ।। जय गणपति सद्गुण सदन कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण जय जय गिरिजालाल।। जय जय जय गणपति राजू। मंगल भरण करण शुभ काजू।। जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्धि विधाता।। वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन।। राजित मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला।। पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं।। सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित।। धनि शिवसुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विधाता।। ऋद्धि सिद्धि तव चँवर डुलावे। मूषक वाहन सोहत द्वारे।। कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगल कारी।। एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी।। भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरि द्विज रूपा।। अतिथि जानि कै गौरी सुखारी। बहु विधि सेवा करी तुम्हारी।। अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा।। मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण यहि काला।। गणनायक गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम रूप भगवाना।। अस कहि अन्त...