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Mata Vaishno Devi Yatra 2026: कटरा से भवन संपूर्ण गाइड, नियम और बजट होटल्स

  Mata Vaishno Devi Yatra 2026: कटरा से भवन तक की संपूर्ण यात्रा गाइड, नए नियम, बेस्ट होटल्स, खर्च और ज़रूरी टिप्स Mata Vaishno Devi Yatra Complete Guide: हिंदू धर्म के चार प्रमुख शक्तिपीठों में से एक, माता वैष्णो देवी मंदिर जम्मू-कश्मीर के कटरा से लगभग 13 किलोमीटर की दूरी पर त्रिकुटा पर्वत पर स्थित है। यहाँ भक्तों को माता रानी के तीन प्राकृतिक स्वरूपों—महाकाली, महालक्ष्मी और मां सरस्वती के पिंडी रूप में अलौकिक दर्शन होते हैं। मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से आने वाले सभी श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यदि आप भी वर्ष 2026 में माता वैष्णो देवी यात्रा की प्लानिंग कर रहे हैं, तो यह विस्तृत यात्रा गाइड आपके सफर को बेहद आसान और सुखद बना देगी। इस लेख में हम कटरा से लेकर मुख्य भवन और भैरव घाटी तक की पूरी यात्रा, बेस्ट बजट होटल्स, नए नियम और खर्चों के बारे में विस्तार से जानेंगे। यह भी पढ़े:-  Char Dham Yatra 2026: चारधाम यात्रा ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन, VIP दर्शन बुकिंग और बेस्ट होटल पैकेज गाइड Diwali 2026 Date: जानिए सही तारीख, लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त और इस दिन क्या खरीदना ह...

माँ मातंगी साधना की गुप्त विधि, मंत्र और कवच | Maa Matangi Sadhna Vidhi

"माँ मातंगी साधना : आप सभी को मेरा नमस्कार। आज मैं इस पोस्ट के माध्यम से आप सब को 9वीं महाविद्या माँ मातंगी की साधना के बारे में अवगत कराने का प्रयास करूँगा। तंत्र शास्त्रों के अनुसार, माँ मातंगी साधना विधि, मंत्र और कवच का पालन करने से साधक को समस्त प्रकार के भौतिक सुख प्राप्त होते हैं..." आप सभी मां के भक्त जन साल के किसी भी नवरात्री /गुप्त नवरात्री /अक्षय तृतीया या किसी भी शुभ मुहूर्त या शुक्ल पक्ष में शुरु कर सकते हैं. इस साल 2026 में  शारदीय नवरात्री,  11 अक्टूबर  2026 से है।  मां को प्रसन्न कर सकते हैं और जो भी माँ मातंगी की साधना करना चाहते है, जो अपने जीवन में गृहस्थ समस्याओं से कलह कलेश आर्थिक तंगी ओर रोग ,तंत्र जादू टोना से पीड़ित है वो मां मातंगी जी की साधना एक बार जरूर करके देखे उन्हें जरूर लाभ होगा ये मेरा विश्वास है। मां अपने शरण में आए हुए हर भक्त की मनोकामना पूर्ण करती है।ये साधना रात को पूरे 10 बजे शुरू करे।इस साधना में आपको जो जरूरी सामग्री चाहिए वो कुछ इस प्रकार है। 

वेदसार शिव स्तोत्र: Vedasara Shiva Stotram Lyrics in Hindi With Meaning

Vedasara Shiva Stotram: वेदसार शिव स्तोत्र पाठ से दूर होंगे सभी कष्ट, जानिए अर्थ और महत्व Vedasara Shiva Stotram in Hindi: हिंदू धर्म में भगवान शिव की आराधना के लिए कई स्तोत्र और मंत्र बताए गए हैं। इनमें आदि गुरु शंकराचार्य जी द्वारा रचित वेदसार शिव स्तोत्र का विशेष स्थान है। मान्यता है कि इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। अगर आप भी महादेव की कृपा पाना चाहते हैं, तो इस पावन स्तोत्र का पाठ अवश्य करें। यहाँ हमने वेदसार शिव स्तोत्र के सभी श्लोक (Vedasara Shiva Stotram Lyrics) और उनका सरल हिंदी अर्थ दिया है। वेदसार शिव स्तोत्र श्लोक और हिंदी अर्थ (Vedasara Shiva Stotram Lyrics with Meaning) श्लोक 1 पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम्। जटाजूटमध्ये स्फुरद्गांगवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम्।।1।। अर्थ: जो समस्त जीवों के स्वामी हैं और पापों का नाश करने वाले हैं। जो हाथी की खाल पहनते हैं और परम पूजनीय हैं। जिनकी जटाओं में गंगा जी की धारा चमकती है, उन कामदेव के शत्रु महादेव का मैं स्मरण करता हूँ‌। श्लोक 2 महेशं सुरे...

मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् //mrit Sanjivan strotam//

 मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् ।। ............................. एवमाराध्य गौरीशं देवं मृत्युञ्जयेश्वरम् | मृतसञ्जीवनं नाम्ना कवचं प्रजपेत् सदा ||१|| सारात्सारतरं पुण्यं गुह्यात्गुह्यतरं शुभम् | महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनामकम् ||२|| समाहितमना भूत्वा शृणुश्व कवचं शुभम् | शृत्वैतद्दिव्य कवचं रहस्यं कुरु सर्वदा ||३|| वराभयकरो यज्वा सर्वदेवनिषेवित: | मृत्युञ्जयो महादेव: प्राच्यां मां पातु सर्वदा ||४|| दधान: शक्तिमभयां त्रिमुखं षड्भुज: प्रभु: | सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा ||५|| अष्टादशभुजोपेतो दण्डाभयकरो विभु: | यमरूपी महादेवो दक्षिणस्यां सदावतु ||६|| खड्गाभयकरो धीरो रक्षोगणनिषेवित: | रक्षोरूपी महेशो मां नैऋत्यां सर्वदावतु ||७|| पाशाभयभुज: सर्वरत्नाकरनिषेवित: | वरूणात्मा महादेव: पश्चिमे मां सदावतु ||८|| गदाभयकर: प्राणनायक: सर्वदागति: | वायव्यां वारुतात्मा मां शङ्कर: पातु सर्वदा ||९|| शङ्खाभयकरस्थो मां नायक: परमेश्वर: | सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शङ्कर: प्रभु: ||१०|| शूलाभयकर: सर्वविद्यानामधिनायक: | ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वर: ||११|| ऊर्ध्वभागे ब्रह्मरूपी विश्वात्माऽध...

श्री गुरु स्तोत्रम् :shree guru strotam

 श्री गुरु स्तोत्रम् अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥ १ ॥ अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया । चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥ २ ॥ गुरुब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुरेव परम् ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥ ३ ॥ स्थावरं जङ्गमं व्याप्तं यत्किञ्चित् सचराचरम्। तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥ ४ ॥ चिन्मयं व्यापियत् सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरं । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥ ६ ॥ सर्वश्रुति शिरोरत्न विराजित पदांबुजः । वेदान्ताम् बुज सूर्यो यः तस्मै श्री गुरवे नमः ॥ ७ ॥ ज्ञानशक्ति समारूढः तत्वमाला विभूषितः । भुक्तिमुक्ति प्रदाता च तस्मै श्री गुरवे नमः ॥ ८ ॥ अनेकजन्मसंप्राप्त कर्मबन्ध विदहिने । आत्मज्ञान प्रदानेन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥ ९ ॥ शोषणं भवषिधोश्च ज्ञापनं सारसंपदः । गुरोः पादोदकं सम्यक् तस्मै श्री गुरवे नमः ॥ १० ॥ न गुरोरधिकं तत्वं न गुरोरधिकं तपः । तत्वज्ञानात् परम् नास्ति तस्मै श्री गुरवे नमः ॥ ११ ॥ मन्नाथः श्री जगन्नाथः मद्गुरुः श्री जगद्गुरुः । मदात्मा सर्वभूतात्मा तस्मै श्री गुरवे नमः ...

गणेश कवच ganesh kawach path

भगवान श्रीगणेश सभी जगहों पर अग्रपूजा के अधिकारी हैं. किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत श्रीगणेश की पूजा के साथ ही करने का विधान है. श्री गणेश की पूजा से धन धान्य और समस्त सुखों की प्राप्ति होती है. इसी प्रकार शास्त्रों में श्रीगणेश कवच का उल्लेख आता है. गणेश कवच को सिद्ध कर लेने मात्र से मनुष्‍य मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कर सकता है. शनैश्‍चरदेप के विनयपूर्ण आग्रह के बा भगवान श्रीविष्‍णु ने उन्हें गणेश कवच की दीक्षा दी. भगवान श्रीविष्‍णु ने कहा - दस लाख जप करने के बाद गणेश कवच सिद्ध हो जाता है. कवच सिद्ध कर लेने पर मनुष्‍य मृत्यु पर भी विजय प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है. यह सिद्ध कवच धारण करने पर मनुष्‍य वाग्मी, चिरजीवी, सर्वत्र विजयी और पूज्य हो जाता है. इस मालामंत्र और कवच के प्रभाव से मनुष्‍य के सारे पातकोप पातक ध्‍वस्त हो जाते हैं. इस कवच के शब्द श्रवण मात्र से ही भूत-प्रेत, पिशाच, कूष्‍माण्‍ड, ब्रह्मराक्षस, डाकिनी, योगिनी, वेताल आदि बालग्रह, ग्रह तथा क्षेत्रपाल आदि दूर भाग जाते हैं. कवचधारी पुरुष को आधि (मानसिक रोग), व्याधि ( शारीरिक रोग), और भयप्रद शोक स्पर्श नहीं कर पाते. इस प्रकार...

कालभैरव साधना विधि और नाम / kaal bhairav sadhna

  श्री कालभैरवाष्टमी सर्वश्रेष्ठ है यह साधना करने के लिए  दसों दिशाओं से रक्षा करते हैं श्री भैरव। श्री भैरव के अनेक रूप हैं जिसमें प्रमुख रूप से बटुक भैरव, महाकाल भैरव तथा स्वर्णाकर्षण भैरव प्रमुख हैं। जिस भैरव की पूजा करें उसी रूप के नाम का उच्चारण होना चाहिए। सभी भैरवों में बटुक भैरव उपासना का अधिक प्रचलन है। तांत्रिक ग्रंथों में अष्ट भैरव के नामों की प्रसिद्धि है। वे इस प्रकार हैं- 1. असितांग भैरव, 2. चंड भैरव, 3. रूरू भैरव, 4. क्रोध भैरव, 5. उन्मत्त भैरव, 6. कपाल भैरव, 7. भीषण भैरव 8. संहार भैरव। क्षेत्रपाल व दण्डपाणि के नाम से भी इन्हें जाना जाता है। श्री भैरव से काल भी भयभीत रहता है अत: उनका एक रूप'काल भैरव'के नाम से विख्यात हैं। दुष्टों का दमन करने के कारण इन्हें"आमर्दक"कहा गया है। शिवजी ने भैरव को काशी के कोतवाल पद पर प्रतिष्ठित किया है। जिन व्यक्तियों की जन्म कुंडली में शनि, मंगल, राहु आदि पाप ग्रह अशुभ फलदायक हों, नीचगत अथवा शत्रु क्षेत्रीय हों। शनि की साढ़े-साती या ढैय्या से पीडित हों, तो वे व्यक्ति भैरव जयंती अथवा किसी माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी, रविवार,...

पार्वतीवल्लभनीलकण्ठाष्टकम् || Sri Parvati Vallabh Neelkanthastkam ||

 || पार्वतीवल्लभनीलकण्ठाष्टकम्  || || Sri Parvati Vallabh Neelkanthastkam || नमो भूतनाथं नमो देवदेवं     नमः कालकालं नमो दिव्यतेजम् । नमः कामभस्मं नमश्शान्तशीलं     भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ १॥ सदा तीर्थसिद्धं सदा भक्तरक्षं     सदा शैवपूज्यं सदा शुभ्रभस्मम् । सदा ध्यानयुक्तं सदा ज्ञानतल्पं     भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ २॥ श्मशाने शयानं महास्थानवासं     शरीरं गजानं सदा चर्मवेष्टम् । पिशाचं निशोचं पशूनां प्रतिष्ठं     भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ३॥ फणीनाग कण्ठे भुजङ्गाद्यनेकं     गले रुण्डमालं महावीर शूरम् । कटिं व्याघ्रचर्मं चिताभस्मलेपं     भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ४॥ शिरश्शुद्धगङ्गा शिवा वामभागं     बृहद्दिव्यकेशं सदा मां त्रिनेत्रम् ।  फणी नागकर्णं सदा भालचन्द्रं       भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ५॥ करे शूलधारं महाकष्टनाशं     सुरेशं वरेशं महेशं जनेशम् । धनेशस्तुतेशं ध्वजेशं गिरीशं       भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ...

रुद्र अष्टकम ।। रूद्राष्टकम ।।

 ।। रूद्राष्टकम ।।   नमामीशमीशान निर्वाण रूपं,     विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदः स्वरूपम्‌। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं,     चिदाकाश माकाशवासं भजेऽहम्‌।।   निराकार मोंकार मूलं तुरीयं,     गिराज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्‌। करालं महाकाल कालं कृपालुं,     गुणागार संसार पारं नतोऽहम्‌।। तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं,     मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्‌। स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारू गंगा,    लसद्भाल बालेन्दु कण्ठे भुजंगा।।   चलत्कुण्डलं शुभ्र नेत्रं विशालं,     प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्‌। मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं,     प्रिय शंकरं सर्वनाथं भजामि।।   प्रचण्डं प्रकष्टं प्रगल्भं परेशं,     अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम्‌। त्रयशूल निर्मूलनं शूल पाणिं,     भजेऽहं भवानीपतिं भाव गम्यम्‌।।   कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी,    सदा सच्चिनान्द दाता पुरारी। चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी,     प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी...

रुद्र चण्डी कवचम् || श्रीरुद्रचण्डी कवचम् ||

 ।। श्रीरुद्रचण्डी कवचम् ।।            पूर्वपीठिका- श्रीकार्तिकेय उवाच- कवचं चण्डिकादेव्याः श्रोतुमिच्छामि ते शिव! । यदि तेऽस्ति कृपा नाथ! कथयस्व जगत्प्रभो ! ।। श्रीशिव उवाच- श‍ृणु वत्स  प्रवक्ष्यामि चण्डिकाकवचम् शुभम्। भुक्तिमुक्तिप्रदातारमायुष्यं सर्वकामदम्।। दुर्लभं सर्वदेवानां सर्वपापनिवारणम्। मन्त्रसिद्धिकरं  पुंसां ज्ञानसिद्धिकरं  परम्।। विनियोगः - श्रीरुद्र चण्डिकाकवचस्य श्रीभैरव ऋषिः, अनुष्टुप्छन्दः, श्रीचण्डिका देवता, चतुर्वर्गफलप्राप्त्यर्थं पाठे विनियोगः।। ऋष्यादि न्यासः - श्रीभैरव ऋषये नमः शिरसि। अनुष्टुप्छन्दसे नमः मुखे। श्रीचण्डिकादेवतायै नमः हृदि। चतुर्वर्गफलप्राप्त्यर्थं पाठे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे।।         अथ  कवचस्तोत्रम्- चण्डिका मेऽग्रतः पातु आग्नेय्यां भवसुन्दरी। याम्यां पातु महादेवी नैरृत्यां पातु पार्वती।। वारुणे चण्डिका पातु चामुण्डा पातु वायवे। उत्तरे भैरवी पातु ईशाने पातु शङ्करी।। पूर्वे पातु शिवा  देवी ऊर्ध्वे पातु महेश्वरी। अधः पातु सदाऽनन्ता मूलाधार निवासिनी।। मूर्ध्नि पातु महा...

एकमुखी हनुमत कवच ।। श्रीएकमुखी हनुमत्कवचम् ।।

 ।।श्रीएकमुखी हनुमत्कवचम् ।।   अथ श्रीएकमुखी हनुमत्कवचं। मनोजवं मारुततुल्यवेगं      जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं     श्रीरामदूतं   शरणं   प्रपद्ये।। श्रीहनुमते नमः। एकदा सुखमासीनं शङ्करं लोकशङ्करम्। पप्रच्छ गिरिजाकान्तं कर्पूरधवलं शिवम्।। पार्वत्युवाच- भगवन्देवदेवेश लोकनाथ जगद्गुरो। शोकाकुलानां लोकानां केन रक्षा भवेद्ध्रुवम्।। सङ्ग्रामे सङ्कटे घोरे भूतप्रेतादिके भये। दुःखदावाग्निसन्तप्तचेतसां दुःखभागिनाम्।। ईश्वर उवाच- श‍ृणु देवि प्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया। विभीषणाय रामेण प्रेम्णा दत्तं च यत्पुरा।। कवचं कपिनाथस्य वायुपुत्रस्य धीमतः। गुह्यं ते सम्प्रवक्ष्यामि विशेषाच्छृणु सुन्दरि।। ॐ अस्य श्रीहनुमत् कवचस्त्रोत्रमन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषिः। अनुष्टुप्छन्दः। श्रीमहावीरो हनुमान् देवता। मारुतात्मज इति बीजम्।। ॐ अञ्जनासूनुरिति शक्तिः। ॐ ह्रैं ह्रां ह्रौं इति कवचम्। स्वाहा इति कीलकम्। लक्ष्मणप्राणदाता इति बीजम्। मम सकलकार्यसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।। अथ न्यासः - ॐ ह्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।...

दारिद्रयदहन शिव स्तोत्र || Daridya dahan shiv stotram ||

  ।। दारिद्रयदहन शिव स्तोत्र ।।  देव बड़े दाता बड़े शंकर बड़े भोरे।  किये दूर दु:ख सबन के जिन-जिननें कर जोरे।। त्रिलोक में वन्दनीय भगवान शिव अकिंचन हैं, त्रिदेवों में निराले हैं- संसार से निर्लिप्त, स्वयं अपने पास कुछ भी नहीं, मृत्युरूपी सर्प को गले में लिपटाए हुए, परन्तु संसार का सर्वश्रेष्ठ सुख व वैभव उनकी मुट्ठी में है। हाथ में त्रिशूल द्वारा संसार के तीन महान अवगुणों- क्रोध, मोह व लोभ पर उनका अंकुश है। सारे संसार की सम्पत्तियां उनके पैरों में लोटती हैं। जिस समय वह नन्दीबैल पर सवार होकर बाहर निकलते हैं, उस समय स्वर्गाधिपति इन्द्र अपने ऐरावत हाथी से उतरकर भगवान शिव के चरणों पर अपना मस्तक टेकते हैं और अपने मुकुट में लगे पारिजात पुष्पों से भगवान शिव के चरणों में पुष्पांजलि अर्पित करते हैं। अपना जीवन अकिंचन रखने वाले औघड़दानी शिव जिस पर प्रसन्न हो जाएं, उसे सभी कुछ दे देते हैं। संसार में मांगने वाला किसी को अच्छा नहीं लगता किन्तु भोले-भंडारी मुंह-मांगा वरदान देने में कुछ भी आगा-पीछा नहीं सोचते। जरा-सी भक्ति करने पर, आक, धतूरा, बेलपत्र व जल चढ़ाने मात्र से और गाल बजा...

शिवाष्टकम् || शिव अष्टकम् Shiv Ashtakam ||

 ।। शिवाष्टकम् ।। (शिव अष्टकम्) प्रभुं प्राणनाथं विभुं विश्वनाथं     जगन्नाथनाथं सदानन्दभाजम्। भवद्भव्यभूतेश्वरं भूतनाथं    शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे।। गले रुण्डमालं तनौ सर्पजालं     महाकालकालं गणेशाधिपालम्। जटाजूटगङ्गोत्तरङ्गैर्विशालं    शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे।। मुदामाकरं मण्डनं मण्डयन्तं     महामण्डलं भस्मभूषाधरं तम्। अनादिं ह्यपारं महामोहमारं    शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे।। तटाधोनिवासं महाट्टाट्टहासं     महापापनाशं सदा सुप्रकाशम्। गिरीशं गणेशं सुरेशं महेशं    शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे।। गिरीन्द्रात्मजासङ्गृहीतार्धदेहं     गिरौ संस्थितं सर्वदा सन्निगेहम्। परब्रह्म ब्रह्मादिभिर्वन्द्यमानं    शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे।। कपालं त्रिशूलं कराभ्यां दधानं     पदांभोजनम्राय कामं ददानम्। बलीवर्दयानं सुराणां प्रधानं    शिवं शङ्करं शंभुमीशानमीडे।। शरच्चन्द्रगात्रं गुणानन्दपात्रं    त्रिनेत्रं पवित्रं धनेशस्य मित्रम्। अपर्णाक...

मारुती स्तोत्रम् || Maaruti stotram ||

 ।। मारुतिस्तोत्रम् ।। ॐ नमो वायुपुत्राय भीमरूपाय धीमते। नमस्ते रामदूताय कामरूपाय श्रीमते।। मोहशोकविनाशाय सीताशोकविनाशिने। भग्नाशोकवनायास्तु दग्धलङ्काय वाग्मिने।। गतिनिर्जितवाताय लक्ष्मणप्राणदाय च। वनौकसां वरिष्ठाय वशिने वनवासिने।। तत्त्वज्ञानसुधासिन्धुनिमग्नाय महीयसे। आञ्जनेयाय शूराय सुग्रीवसचिवाय ते।। जन्ममृत्युभयघ्नाय सर्वक्लेशहराय च। नेदिष्ठाय प्रेतभूतपिशाचभयहारिणे।। यातनानाशनायास्तु नमो मर्कटरूपिणे। यक्षराक्षसशार्दूलसर्पवृश्चिकभीहृते।। महाबलाय वीराय चिरञ्जीविन उद्धते। हारिणे वज्रदेहाय चोल्लङ्घितमहाब्धये।। बलिनामग्रगण्याय नमो नमः पाहि मारुते। लाभदोऽसि त्वमेवाशु हनुमन् राक्षसान्तक। यशो जयं च मे देहि शत्रून्नाशय नाशय।। सङ्गीतेन वशीकरोति वरदं क्ष्माजाधवं राघवं यश्चामीकरचारुगात्रसुषमां विस्तारयत्यद्भुताम्। नानातालकलाकलापनिपुणः कौशन्यवद्गायति स प्रीणातु प्रशस्तगानरसिकव्यामोदिशाखामृगः।। दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा। पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम्।। मारुतिं वीरवज्राङ्गं भक्तरक्षणदीक्षितम्। हनुमन्तं सदा वन्दे राममन्त्रप्रचारकम्।। हनुमन्नञ्जनासूनो वायुपुत्र महाब...

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दुर्गा सप्तशती पाठ 4 चतुर्थ अध्याय || by geetapress gorakhpur ||p

 ॥ श्री दुर्गा सप्तशती ॥ चतुर्थोऽध्यायः इन्द्रादि देवताओं द्वारा देवी की स्तुति ॥ध्यानम्॥ ॐ कालाभ्राभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखां शड्‌खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम्। सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं ध्यायेद् दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः॥ सिद्धि की इच्छा रखनेवाले पुरुष जिनकी सेवा करते हैं तथा देवता जिन्हें सब ओर से घेरे रहते हैं, उन ‘जया ’ नामवाली दुर्गादेवी का ध्यान करे । उनके श्रीअंगों की आभा काले मेघ के समान श्याम है । वे अपने कटाक्षों से शत्रुसमूह को भय प्रदान करती हैं । उनके मस्तक पर आबद्ध चन्द्रमा की रेखा शोभा पाती है । वे अपने हाथों में शंख, चक्र, कृपाण और त्रिशूल धारण करती हैं । उनके तीन नेत्र हैं । वे सिंह के कंधेपर चढ़ी हुई हैं और अपने तेज से तीनों लोकोंको परिपूर्ण कर रही हैं । "ॐ" ऋषिरुवाच*॥१॥ शक्रादयः सुरगणा निहतेऽतिवीर्ये तस्मिन्दुरात्मनि सुरारिबले च देव्या। तां तुष्टुवुः प्रणतिनम्रशिरोधरांसा वाग्भिः प्रहर्षपुलकोद्‌गमचारुदेहाः॥२॥ ऋषि कहते हैं - ॥१॥ अत्यन्त पराक्रमी दुरात्मा महिषासुर तथा उसक...

दुर्गा सप्तशती पाठ 12 द्वादश अध्याय || by geetapress gorakhpur ||

  ।। श्री दुर्गा सप्तशती ॥ द्वादशोऽध्यायः देवी-चरित्रों के पाठ का माहात्म् ॥ध्यानम्॥ ॐ विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां कन्याभिः करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम्। हस्तैश्चक्रगदासिखेटविशिखांश्चापं गुणं तर्जनीं बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे॥ मैं तीन नेत्रोंवाली दुर्गादेवी का ध्यान करता हूँ, उनके श्रीअंगों की प्रभा बिजली के समान है । वे सिंह के कंधेपर बैठी हुई भयंकर प्रतीत होती हैं । हाथों में तलवार और ढ़ाल लिये अनेक कन्याएँ उनकी सेवा में खड़ी हैं ।वे अपने हाथों में चक्र, गदा, तलवार, ढ़ाल, बाण, धनुष, पाश और तर्जनी मुद्रा धारण किये हुए हैं । उनका स्वरूप अग्निमय है तथा वे माथे पर चन्द्रमा का मुकुट धारण करती हैं । "ॐ" देव्युवाच॥१॥ एभिः स्तवैश्च् मां नित्यं स्तोष्यते यः समाहितः। तस्याहं सकलां बाधां नाशयिष्याम्यसंशयम्*॥२॥ देवी बोली- ॥१॥ देवताओं ! जो एकाग्रचित होकर प्रतिदिन इन स्तुतियों से मेरा स्तवन करेगा, उसकी सारी बाधा निश्चय हीं दूर कर दूँगी ॥२॥ मधुकैटभनाशं च महिषासुरघातनम्। कीर्तयिष्यन्ति ये तद्वद् वधं शुम्भनिशुम्भयोः॥३॥ जो मधुकैटभ का नाश, महिषा...

दुर्गा सप्तशती पाठ 11 एकादश अध्याय || by geetapress gorakhpur ||

  ॥ श्री दुर्गा सप्तशती ॥ एकादशोऽध्यायः देवताओं द्वारा देवी की स्तुति तथा देवी द्वारा देवताओं को वरदान ॥ध्यानम्॥ ॐ बालरविद्युतिमिन्दुकिरीटां तुङ्‌गकुचां नयनत्रययुक्ताम्। स्मेरमुखीं वरदाङ्‌कुशपाशाभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम्॥ मैं भुवनेश्वरी देवी का ध्यान करता हूँ । उनके श्रीअंगों की आभा प्रभात काल के सुर्य के समान है और मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट है । वे उभरे हुए स्तनों और तीन नेत्रों से युक्त हैं । उनके मुख पर मुस्कान की छटा छायी रहती है और हाथों में वरद, अंकुश, पाश एवं अभय - मुद्रा शोभा पाते हैं । "ॐ" ऋषिरुवाच॥१॥ देव्या हते तत्र महासुरेन्द्रे सेन्द्राः सुरा वह्निपुरोगमास्ताम्। कात्यायनीं तुष्टुवुरिष्टलाभाद्* विकाशिवक्त्राब्जविकाशिताशाः*॥२॥ ऋषि कहते हैं - ॥१॥ देवी के द्वारा वहाँ महादैत्यपति शुम्भ के मारे जाने पर इन्द्र आदि देवता अग्नि को आगे करके उन कात्यायनी देवी की स्तुति करने लगे । उस समय अभीष्ट की प्राप्ति होने से उनके मुख कमल दमक उठे थे और उनके प्रकाश से दिशाएँ भी जगमगा उठी थीं ॥२॥ देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य। प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वंक त्वमीश्व...

हनुमान चालीसा और आरती, बजरंग बाण श्रीं राम स्तुति || hanuman Chalisa ||

Hanuman Chalisa or Aarti:  मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमान जी की विशेष पूजा अर्चना की जाती है, इससे शनि जनित पीड़ा से मुक्ति मिल जाती है, (चाहे शनि की ढैय्या हो या साढ़ेसाती) । इन दिनों में हनुमान जी के मंदिरों में जाकर भक्त हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं साथ ही इनका प्रिय बूंदी का प्रसाद चढ़ाते हैं। बजरंगबली को संकटमोचक भी कहा जाता है क्योंकि ये अपने भक्तों के सभी संकट दूर कर देते हैं। शास्त्रों और पुराणों अनुसार हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए मंगलवार को हनुमान चालीसा का पाठ करके आरती करे और हनुमानजी को बूँदी का भोग लगाए. आइए शुरू करे हनुमान चालीसा का पाठ -    दोहा : श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।  बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।    चौपाई :   जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।। रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।     महाबीर बिक्रम बजरंग   कुमति निवार सुमति के संगी ।।   कंचन बरन बिराज सुबे...