सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् //mrit Sanjivan strotam//

 मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् ।।

.............................

एवमाराध्य गौरीशं देवं मृत्युञ्जयेश्वरम् |

मृतसञ्जीवनं नाम्ना कवचं प्रजपेत् सदा ||१||

सारात्सारतरं पुण्यं गुह्यात्गुह्यतरं शुभम् |

महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनामकम् ||२||

समाहितमना भूत्वा शृणुश्व कवचं शुभम् |

शृत्वैतद्दिव्य कवचं रहस्यं कुरु सर्वदा ||३||

वराभयकरो यज्वा सर्वदेवनिषेवित: |

मृत्युञ्जयो महादेव: प्राच्यां मां पातु सर्वदा ||४||

दधान: शक्तिमभयां त्रिमुखं षड्भुज: प्रभु: |

सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा ||५||

अष्टादशभुजोपेतो दण्डाभयकरो विभु: |

यमरूपी महादेवो दक्षिणस्यां सदावतु ||६||

खड्गाभयकरो धीरो रक्षोगणनिषेवित: |

रक्षोरूपी महेशो मां नैऋत्यां सर्वदावतु ||७||

पाशाभयभुज: सर्वरत्नाकरनिषेवित: |

वरूणात्मा महादेव: पश्चिमे मां सदावतु ||८||

गदाभयकर: प्राणनायक: सर्वदागति: |

वायव्यां वारुतात्मा मां शङ्कर: पातु सर्वदा ||९||

शङ्खाभयकरस्थो मां नायक: परमेश्वर: |

सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शङ्कर: प्रभु: ||१०||

शूलाभयकर: सर्वविद्यानामधिनायक: |

ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वर: ||११||

ऊर्ध्वभागे ब्रह्मरूपी विश्वात्माऽध: सदावतु |

शिरो मे शङ्कर: पातु ललाटं चन्द्रशेखर: ||१२||

भूमध्यं सर्वलोकेशस्त्रिणेत्रो लोचनेऽवतु |

भ्रूयुग्मं गिरिश: पातु कर्णौ पातु महेश्वर: ||१३||

नासिकां मे महादेव ओष्ठौ पातु वृषध्वज: |

जिव्हां मे दक्षिणामूर्तिर्दन्तान्मे गिरिशोऽवतु ||१४||

मृत्युञ्जयो मुखं पातु कण्ठं मे नागभूषण: |

पिनाकि मत्करौ पातु त्रिशूलि हृदयं मम ||१५||

पञ्चवक्त्र: स्तनौ पातु उदरं जगदीश्वर: |

नाभिं पातु विरूपाक्ष: पार्श्वो मे पार्वतिपति: ||१६||

कटद्वयं गिरिशौ मे पृष्ठं मे प्रमथाधिप: |

गुह्यं महेश्वर: पातु ममोरु पातु भैरव: ||१७||

जानुनी मे जगद्धर्ता जङ्घे मे जगदंबिका |

पादौ मे सततं पातु लोकवन्द्य: सदाशिव: ||१८||

गिरिश: पातु मे भार्या भव: पातु सुतान्मम |

मृत्युञ्जयो ममायुष्यं चित्तं मे गणनायक: ||१९||

सर्वाङ्गं मे सदा पातु कालकाल: सदाशिव: |

एतत्ते कवचं पुण्यं देवतानांच दुर्लभम् ||२०||

मृतसञ्जीवनं नाम्ना महादेवेन कीर्तितम् |

सहस्त्रावर्तनं चास्य पुरश्चरणमीरितम् ||२१||

य: पठेच्छृणुयानित्यं श्रावयेत्सु समाहित: |

सकालमृत्यु निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते ||२२||

हस्तेन वा यदा स्पृष्ट्वा मृतं सञ्जीवयत्यसौ |

आधयोव्याधयस्तस्य न भवन्ति कदाचन ||२३||

कालमृत्युमपि प्राप्तमसौ जयति सर्वदा |

अणिमादिगुणैश्वर्यं लभते मानवोत्तम: ||२४||

युद्धारम्भे पठित्वेदमष्टाविंशतिवारकम |

युद्धमध्ये स्थित: शत्रु: सद्य: सर्वैर्न दृश्यते ||२५||

न ब्रह्मादिनी चास्त्राणि क्षयं कुर्वन्ति तस्य वै |

विजयं लभते देवयुद्धमध्येऽपि सर्वदा ||२६||

प्रातरूत्थाय सततं य: पठेत्कवचं शुभम् |

अक्षय्यं लभते सौख्यमिहलोके परत्र च ||२७||

सर्वव्याधिविनिर्मुक्त: सर्वरोगविवर्जित: |

अजरामरणो भूत्वा सदा षोडशवार्षिक: ||२८||

विचरत्यखिलान् लोकान् प्राप्य भोगांश्च दुर्लभान् |

तस्मादिदं महागोप्यं कवचं समुदाहृतम् ||२९||

मृतसञ्जीवनं नाम्ना दैवतैरपि दुर्लभम् |

मृतसञ्जीवनं नाम्ना दैवतैरपि दुर्लभम् ||३०||

|| इति वसिष्ठकृतं मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् ||

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

दुर्गा सप्तशती पाठ 12 द्वादश अध्याय || by geetapress gorakhpur ||

  ।। श्री दुर्गा सप्तशती ॥ द्वादशोऽध्यायः देवी-चरित्रों के पाठ का माहात्म् ॥ध्यानम्॥ ॐ विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां कन्याभिः करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम्। हस्तैश्चक्रगदासिखेटविशिखांश्चापं गुणं तर्जनीं बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे॥ मैं तीन नेत्रोंवाली दुर्गादेवी का ध्यान करता हूँ, उनके श्रीअंगों की प्रभा बिजली के समान है । वे सिंह के कंधेपर बैठी हुई भयंकर प्रतीत होती हैं । हाथों में तलवार और ढ़ाल लिये अनेक कन्याएँ उनकी सेवा में खड़ी हैं ।वे अपने हाथों में चक्र, गदा, तलवार, ढ़ाल, बाण, धनुष, पाश और तर्जनी मुद्रा धारण किये हुए हैं । उनका स्वरूप अग्निमय है तथा वे माथे पर चन्द्रमा का मुकुट धारण करती हैं । "ॐ" देव्युवाच॥१॥ एभिः स्तवैश्च् मां नित्यं स्तोष्यते यः समाहितः। तस्याहं सकलां बाधां नाशयिष्याम्यसंशयम्*॥२॥ देवी बोली- ॥१॥ देवताओं ! जो एकाग्रचित होकर प्रतिदिन इन स्तुतियों से मेरा स्तवन करेगा, उसकी सारी बाधा निश्चय हीं दूर कर दूँगी ॥२॥ मधुकैटभनाशं च महिषासुरघातनम्। कीर्तयिष्यन्ति ये तद्वद् वधं शुम्भनिशुम्भयोः॥३॥ जो मधुकैटभ का नाश, महिषा...

हनुमान चालीसा और आरती, बजरंग बाण श्रीं राम स्तुति || hanuman Chalisa ||

Hanuman Chalisa or Aarti:  मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमान जी की विशेष पूजा अर्चना की जाती है, इससे शनि जनित पीड़ा से मुक्ति मिल जाती है, (चाहे शनि की ढैय्या हो या साढ़ेसाती) । इन दिनों में हनुमान जी के मंदिरों में जाकर भक्त हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं साथ ही इनका प्रिय बूंदी का प्रसाद चढ़ाते हैं। बजरंगबली को संकटमोचक भी कहा जाता है क्योंकि ये अपने भक्तों के सभी संकट दूर कर देते हैं। शास्त्रों और पुराणों अनुसार हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए मंगलवार को हनुमान चालीसा का पाठ करके आरती करे और हनुमानजी को बूँदी का भोग लगाए. आइए शुरू करे हनुमान चालीसा का पाठ -    दोहा : श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।  बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।    चौपाई :   जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।। रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।     महाबीर बिक्रम बजरंग   कुमति निवार सुमति के संगी ।।   कंचन बरन बिराज सुबे...

दुर्गा सप्तशती पाठ 4 चतुर्थ अध्याय || by geetapress gorakhpur ||p

 ॥ श्री दुर्गा सप्तशती ॥ चतुर्थोऽध्यायः इन्द्रादि देवताओं द्वारा देवी की स्तुति ॥ध्यानम्॥ ॐ कालाभ्राभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखां शड्‌खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम्। सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं ध्यायेद् दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः॥ सिद्धि की इच्छा रखनेवाले पुरुष जिनकी सेवा करते हैं तथा देवता जिन्हें सब ओर से घेरे रहते हैं, उन ‘जया ’ नामवाली दुर्गादेवी का ध्यान करे । उनके श्रीअंगों की आभा काले मेघ के समान श्याम है । वे अपने कटाक्षों से शत्रुसमूह को भय प्रदान करती हैं । उनके मस्तक पर आबद्ध चन्द्रमा की रेखा शोभा पाती है । वे अपने हाथों में शंख, चक्र, कृपाण और त्रिशूल धारण करती हैं । उनके तीन नेत्र हैं । वे सिंह के कंधेपर चढ़ी हुई हैं और अपने तेज से तीनों लोकोंको परिपूर्ण कर रही हैं । "ॐ" ऋषिरुवाच*॥१॥ शक्रादयः सुरगणा निहतेऽतिवीर्ये तस्मिन्दुरात्मनि सुरारिबले च देव्या। तां तुष्टुवुः प्रणतिनम्रशिरोधरांसा वाग्भिः प्रहर्षपुलकोद्‌गमचारुदेहाः॥२॥ ऋषि कहते हैं - ॥१॥ अत्यन्त पराक्रमी दुरात्मा महिषासुर तथा उसक...