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जनवरी, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

श्री सत्यनारायण व्रत कथा और आरती: संपूर्ण 5 अध्याय और पूजा विधि (Shri Satyanarayan Katha)

  हिंदू धर्म और सनातन संस्कृति में भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए श्री सत्यनारायण व्रत कथा को सबसे उत्तम, कल्याणकारी और शीघ्र फलदायी माना गया है। स्कंद पुराण के रेवाखंड से ली गई यह पावन कथा कलियुग में मनुष्यों को सभी कष्टों, दरिद्रता और मानसिक दुखों से मुक्ति दिलाकर सुख-समृद्धि प्रदान करती है। यदि आप भी अपने घर में सुख, शांति और धन-धान्य की वृद्धि चाहते हैं, तो इस लेख में सत्यनारायण भगवान की संपूर्ण कथा (5 अध्याय) , पूजा के नियम, सही समय और आरती की पूरी जानकारी विस्तार से दी गई है। 1. श्री सत्यनारायण पूजा के मुख्य नियम और शुभ समय (Rules & Muhurat) भगवान सत्यनारायण (सत्य ही नारायण हैं) की पूजा जितनी सरल है, उतनी ही प्रभावशाली भी है। लेकिन इसका पूर्ण फल तभी मिलता है जब इसे सही नियमों के साथ किया जाए: सर्वोत्तम तिथियां (Best Days): यह कथा और व्रत किसी भी महीने की पूर्णिमा (Purnima) , शुक्ल पक्ष की एकादशी , मास संक्रांति या किसी भी गुरुवार (Thursday) को करना सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। इसके अलावा गृह प्रवेश, विवाह या व्यापार की शुरुआत जैसे मांगलिक अवसरों पर भी इसे अवश्य...

Bhagwan Shiv Ka Madari Avatar: भगवान शिव के मदारी अवतार की पौराणिक कथा, जानिए राम जी और हनुमान जी का यह गुप्त रहस्य

Bhagwan Shiv Ka Madari Avatar: जानिए राम जी और हनुमान जी से जुड़ा यह गुप्त रहस्य शिव महापुराण (Shiva Mahapuran) में भगवान शंकर के कई अद्भुत और कल्याणकारी अवतारों का वर्णन मिलता है। इन्हीं में से एक परम दिव्य और लीला मयी अवतार है— भगवान शिव का मदारी अवतार (Bhagwan Shiv Ka Madari Avatar)। यह पौराणिक कथा प्रभु श्री राम के बाल्यावस्था और मर्यादा पुरुषोत्तम के प्रति महादेव की अनन्य भक्ति से जुड़ी हुई है। आइए जानते हैं कि क्यों देवाधिदेव महादेव को कैलाश छोड़कर एक मदारी का भेष बनाना पड़ा और इस कथा का परम भक्त हनुमान जी से क्या संबंध है। भगवान शिव को क्यों लेना पड़ा मदारी का अवतार? (Shiva Madari Avatar Story) यह पावन कथा त्रेतायुग की है, जब अयोध्या धाम में प्रभु श्री राम का जन्म हुआ था। चारों ओर हर्ष और उल्लास का वातावरण था। जब भगवान शिव को यह ज्ञात हुआ कि उनके आराध्य प्रभु श्री राम ने पृथ्वी पर बाल रूप में अवतार लिया है, तो उनके मन में बालक राम के दर्शन की तीव्र अभिलाषा जागृत हुई। परंतु, समस्या यह थी कि यदि महादेव अपने वास्तविक रूप में अयोध्या जाते, तो राजमहल में खलबली मच जाती। इसलिए, उमानाथ...

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दुर्गा सप्तशती पाठ 4 चतुर्थ अध्याय || by geetapress gorakhpur ||p

 ॥ श्री दुर्गा सप्तशती ॥ चतुर्थोऽध्यायः इन्द्रादि देवताओं द्वारा देवी की स्तुति ॥ध्यानम्॥ ॐ कालाभ्राभां कटाक्षैररिकुलभयदां मौलिबद्धेन्दुरेखां शड्‌खं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम्। सिंहस्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीं ध्यायेद् दुर्गां जयाख्यां त्रिदशपरिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः॥ सिद्धि की इच्छा रखनेवाले पुरुष जिनकी सेवा करते हैं तथा देवता जिन्हें सब ओर से घेरे रहते हैं, उन ‘जया ’ नामवाली दुर्गादेवी का ध्यान करे । उनके श्रीअंगों की आभा काले मेघ के समान श्याम है । वे अपने कटाक्षों से शत्रुसमूह को भय प्रदान करती हैं । उनके मस्तक पर आबद्ध चन्द्रमा की रेखा शोभा पाती है । वे अपने हाथों में शंख, चक्र, कृपाण और त्रिशूल धारण करती हैं । उनके तीन नेत्र हैं । वे सिंह के कंधेपर चढ़ी हुई हैं और अपने तेज से तीनों लोकोंको परिपूर्ण कर रही हैं । "ॐ" ऋषिरुवाच*॥१॥ शक्रादयः सुरगणा निहतेऽतिवीर्ये तस्मिन्दुरात्मनि सुरारिबले च देव्या। तां तुष्टुवुः प्रणतिनम्रशिरोधरांसा वाग्भिः प्रहर्षपुलकोद्‌गमचारुदेहाः॥२॥ ऋषि कहते हैं - ॥१॥ अत्यन्त पराक्रमी दुरात्मा महिषासुर तथा उसक...

दुर्गा सप्तशती पाठ 12 द्वादश अध्याय || by geetapress gorakhpur ||

  ।। श्री दुर्गा सप्तशती ॥ द्वादशोऽध्यायः देवी-चरित्रों के पाठ का माहात्म् ॥ध्यानम्॥ ॐ विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां कन्याभिः करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम्। हस्तैश्चक्रगदासिखेटविशिखांश्चापं गुणं तर्जनीं बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे॥ मैं तीन नेत्रोंवाली दुर्गादेवी का ध्यान करता हूँ, उनके श्रीअंगों की प्रभा बिजली के समान है । वे सिंह के कंधेपर बैठी हुई भयंकर प्रतीत होती हैं । हाथों में तलवार और ढ़ाल लिये अनेक कन्याएँ उनकी सेवा में खड़ी हैं ।वे अपने हाथों में चक्र, गदा, तलवार, ढ़ाल, बाण, धनुष, पाश और तर्जनी मुद्रा धारण किये हुए हैं । उनका स्वरूप अग्निमय है तथा वे माथे पर चन्द्रमा का मुकुट धारण करती हैं । "ॐ" देव्युवाच॥१॥ एभिः स्तवैश्च् मां नित्यं स्तोष्यते यः समाहितः। तस्याहं सकलां बाधां नाशयिष्याम्यसंशयम्*॥२॥ देवी बोली- ॥१॥ देवताओं ! जो एकाग्रचित होकर प्रतिदिन इन स्तुतियों से मेरा स्तवन करेगा, उसकी सारी बाधा निश्चय हीं दूर कर दूँगी ॥२॥ मधुकैटभनाशं च महिषासुरघातनम्। कीर्तयिष्यन्ति ये तद्वद् वधं शुम्भनिशुम्भयोः॥३॥ जो मधुकैटभ का नाश, महिषा...

दुर्गा सप्तशती पाठ 11 एकादश अध्याय || by geetapress gorakhpur ||

  ॥ श्री दुर्गा सप्तशती ॥ एकादशोऽध्यायः देवताओं द्वारा देवी की स्तुति तथा देवी द्वारा देवताओं को वरदान ॥ध्यानम्॥ ॐ बालरविद्युतिमिन्दुकिरीटां तुङ्‌गकुचां नयनत्रययुक्ताम्। स्मेरमुखीं वरदाङ्‌कुशपाशाभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम्॥ मैं भुवनेश्वरी देवी का ध्यान करता हूँ । उनके श्रीअंगों की आभा प्रभात काल के सुर्य के समान है और मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट है । वे उभरे हुए स्तनों और तीन नेत्रों से युक्त हैं । उनके मुख पर मुस्कान की छटा छायी रहती है और हाथों में वरद, अंकुश, पाश एवं अभय - मुद्रा शोभा पाते हैं । "ॐ" ऋषिरुवाच॥१॥ देव्या हते तत्र महासुरेन्द्रे सेन्द्राः सुरा वह्निपुरोगमास्ताम्। कात्यायनीं तुष्टुवुरिष्टलाभाद्* विकाशिवक्त्राब्जविकाशिताशाः*॥२॥ ऋषि कहते हैं - ॥१॥ देवी के द्वारा वहाँ महादैत्यपति शुम्भ के मारे जाने पर इन्द्र आदि देवता अग्नि को आगे करके उन कात्यायनी देवी की स्तुति करने लगे । उस समय अभीष्ट की प्राप्ति होने से उनके मुख कमल दमक उठे थे और उनके प्रकाश से दिशाएँ भी जगमगा उठी थीं ॥२॥ देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य। प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वंक त्वमीश्व...

हनुमान चालीसा और आरती, बजरंग बाण श्रीं राम स्तुति || hanuman Chalisa ||

Hanuman Chalisa or Aarti:  मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमान जी की विशेष पूजा अर्चना की जाती है, इससे शनि जनित पीड़ा से मुक्ति मिल जाती है, (चाहे शनि की ढैय्या हो या साढ़ेसाती) । इन दिनों में हनुमान जी के मंदिरों में जाकर भक्त हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं साथ ही इनका प्रिय बूंदी का प्रसाद चढ़ाते हैं। बजरंगबली को संकटमोचक भी कहा जाता है क्योंकि ये अपने भक्तों के सभी संकट दूर कर देते हैं। शास्त्रों और पुराणों अनुसार हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए मंगलवार को हनुमान चालीसा का पाठ करके आरती करे और हनुमानजी को बूँदी का भोग लगाए. आइए शुरू करे हनुमान चालीसा का पाठ -    दोहा : श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।  बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।    चौपाई :   जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।। रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।     महाबीर बिक्रम बजरंग   कुमति निवार सुमति के संगी ।।   कंचन बरन बिराज सुबे...