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पार्वतीवल्लभनीलकण्ठाष्टकम् || Sri Parvati Vallabh Neelkanthastkam ||

 || पार्वतीवल्लभनीलकण्ठाष्टकम्  || || Sri Parvati Vallabh Neelkanthastkam || नमो भूतनाथं नमो देवदेवं     नमः कालकालं नमो दिव्यतेजम् । नमः कामभस्मं नमश्शान्तशीलं     भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ १॥ सदा तीर्थसिद्धं सदा भक्तरक्षं     सदा शैवपूज्यं सदा शुभ्रभस्मम् । सदा ध्यानयुक्तं सदा ज्ञानतल्पं     भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ २॥ श्मशाने शयानं महास्थानवासं     शरीरं गजानं सदा चर्मवेष्टम् । पिशाचं निशोचं पशूनां प्रतिष्ठं     भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ३॥ फणीनाग कण्ठे भुजङ्गाद्यनेकं     गले रुण्डमालं महावीर शूरम् । कटिं व्याघ्रचर्मं चिताभस्मलेपं     भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ४॥ शिरश्शुद्धगङ्गा शिवा वामभागं     बृहद्दिव्यकेशं सदा मां त्रिनेत्रम् ।  फणी नागकर्णं सदा भालचन्द्रं       भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ५॥ करे शूलधारं महाकष्टनाशं     सुरेशं वरेशं महेशं जनेशम् । धनेशस्तुतेशं ध्वजेशं गिरीशं       भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ६॥ उदानं सुदासं सुकैलासवासं       धरा निर्धरं संस्थितं ह्यादिदेवम् । अजा हेमकल्पद्रुमं कल्पसेव्यं     भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ७॥ मुनीनां वरेण्यं ग

गणेश चालीसा पाठ || Ganesh chalisa ||

 ।। श्री गणेश चालीसा ।। जय गणपति सद्गुण सदन कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण जय जय गिरिजालाल।। जय जय जय गणपति राजू।  मंगल भरण करण शुभ काजू।। जय गजबदन सदन सुखदाता।  विश्व विनायक बुद्धि विधाता।। वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन।। राजित मणि मुक्तन उर माला।  स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला।। पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।  मोदक भोग सुगन्धित फूलं।। सुन्दर पीताम्बर तन साजित।  चरण पादुका मुनि मन राजित।। धनि शिवसुवन षडानन भ्राता।  गौरी ललन विश्व-विधाता।। ऋद्धि सिद्धि तव चँवर डुलावे।  मूषक वाहन सोहत द्वारे।। कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी।  अति शुचि पावन मंगल कारी।। एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी।। भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरि द्विज रूपा।। अतिथि जानि कै गौरी सुखारी।  बहु विधि सेवा करी तुम्हारी।। अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा।  मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा।। मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला।  बिना गर्भ धारण यहि काला।। गणनायक गुण ज्ञान निधाना।  पूजित प्रथम रूप भगवाना।। अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै।  पलना पर बालक स्वरूप ह्वै।। बनि शिशु रुदन जबहि त

शिव विवाह की कथा || शिवपार्वती विवाह कथा ||

  शिवपार्वती विवाह कथा   सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा।। तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई।। भावार्थ- सती ने मरते समय भगवान हरि से यह वर माँगा कि मेरा जन्म-जन्म में शिवजी के चरणों में अनुराग रहे। इसी कारण उन्होंने हिमाचल के घर जाकर पार्वती के शरीर से जन्म लिया। सती के विरह में शंकरजी की दयनीय दशा हो गई। वे हर पल सती का ही ध्यान करते रहते और उन्हीं की चर्चा में व्यस्त रहते। उधर सती ने भी शरीर का त्याग करते समय संकल्प किया था कि मैं राजा हिमालय के यहाँ जन्म लेकर शंकरजी की अर्द्धांगिनी बनूँ। अब जगदम्बा का संकल्प व्यर्थ होने से तो रहा। वे उचित समय पर राजा हिमालय की पत्नी मेनका के गर्भ में प्रविष्ट होकर उनकी कोख में से प्रकट हुईं। पर्वतराज की पुत्री होने के कारण वे 'पार्वती' कहलाईं। जब पार्वती बड़ी होकर सयानी हुईं तो उनके माता-पिता को अच्छा वर तलाश करने की चिंता सताने लगी। एक दिन अचानक देवर्षि नारद राजा हिमालय के महल में आ पहुँचे और पार्वती को देख कहने लगे कि इसका विवाह शंकरजी के साथ होना चाहिए और वे ही सभी दृष्टि से इसके योग्य हैं। पार्वती के

वेदसार शिवस्तव: || Vedsar shivstav ||

 वेदसार शिवस्तव: पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम् जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम् ॥१॥ महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम् विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम् ॥२॥ गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम् भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गंभवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम् ॥३॥ शिवाकान्त शंभो शशाङ्कार्धमौले महेशान शूलिञ्जटाजूटधारिन् त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूपः प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप ॥४॥ परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं निरीहं निराकारमोंकारवेद्यम् यतो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम् ॥५॥ न भूमिर्नं चापो न वह्निर्न वायु- र्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा न गृष्मो न शीतं न देशो न वेषो न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीडे ॥६॥ अजं शाश्वतं कारणं कारणानां शिवं केवलं भासकं भासकानाम् तुरीयं तमःपारमाद्यन्तहीनं प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम् ॥७॥ नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य ॥

शिव नामावली अष्टक || Shivashtak ||

 ।। भगवान शिव का नामावली अष्टक ।। संसार में ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है, जो स्तुति से प्रसन्न न हो जाता हो। भगवान शिव आशुतोष (शीघ्र ही प्रसन्न होने वाले) हैं। अत: यदि उनके विभिन्न नामों के साथ उनकी आराधना की जाए तो वे शीघ्र ही प्रसन्न होकर आराधक को सांसारिक पीड़ाओं से मुक्त कर मनवांछित वस्तु प्रदान कर देते हैं। भगवान शिव का नामावल्यष्टक (नामावली का अष्टक) श्रीशंकराचार्यजी द्वारा रचित एक ऐसा ही सुन्दर स्तोत्र है जिसके आठ पदों में भगवान शिव के विभिन्न नामों का गान कर सांसारिक दु:खों से रक्षा की प्रार्थना की गई है और नवें पद में उन्हें वंदन किया गया है। श्रद्धा भक्ति से किए गए इस स्तोत्र के नित्य पाठ से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होकर आराधक का कल्याण कर देते हैं। सांसारिक दु:खों से मुक्ति के लिए भगवान शिव का नामावली- ।। शिवनामावल्यष्टकम् ।। हे चन्द्रचूड मदनान्तक शूलपाणे स्थाणो गिरीश गिरिजेश महेश शम्भो। भूतेश भीतभयसूदन मामनाथं संसारदु:खगहनाज्जगदीश रक्ष।। हे चन्द्रचूड! (चन्द्रमा को सिर पर धारण करने वाले), हे मदनान्तक! (कामदेव को भस्म कर देने वाले), हे शूलपाणे! हे स्थाणो! (सदा स्थिर रहने व

खजूर के फायदे और इसके औषधीय गुण || Health benefits of dates ||

 खजूर के औषधीय गुण छुहारा और खजूर एक ही पेड़ की देन है। इन दोनों की तासीर गर्म होती है और ये दोनों शरीर को स्वस्थ रखने, मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। गर्म तासीर होने के कारण सर्दियों में तो इसकी उपयोगिता और बढ़ जाती है। आइए, इस बार जानें छुहारा और खजूर के फायदे के बारे में- 1. खजूर में छुहारे से ज्यादा पौष्टिकता होती है। खजूर मिलता भी सर्दी में ही है। अगर पाचन शक्ति अच्छी हो तो खजूर खाना ज्यादा फायदेमंद है। छुहारे का सेवन तो सालभर किया जा सकता है, क्योंकि यह सूखा फल बाजार में सालभर मिलता है।  2.छुहारा यानी सूखा हुआ खजूर आमाशय को बल प्रदान करता है।  3. छुहारे की तासीर गर्म होने से ठंड के दिनों में इसका सेवन नाड़ी के दर्द में भी आराम देता है।  4.छुहारा खुश्क फलों में गिना जाता है, जिसके प्रयोग से शरीर हृष्ट-पुष्ट बनता है। शरीर को शक्ति देने के लिए मेवों के साथ छुहारे का प्रयोग खासतौर पर किया जाता है।  5. छुहारे व खजूर दिल को शक्ति प्रदान करते हैं। यह शरीर में रक्त वृद्धि करते हैं।  6.साइटिका रोग से पीड़ित लोगों को इससे विशेष लाभ होता है।  7.खजूर के सेवन से दमे क

मोहिनी रचित कृष्ण स्तोत्र || मोहिनीरचितम् श्रीकृष्ण स्तोत्रम् ||

 ।। मोहिनीरचितम् श्रीकृष्ण स्तोत्रम् ।। श्री गणेशाय नमः। मोहिन्युवाच। सर्वेन्द्रियाणां प्रवरं विष्णोरंशं च मानसम्। तदेव कर्मणां बीजं तदुद्भव नमोऽस्तु ते।। स्वयमात्मा हि भगवान् ज्ञानरूपो महेश्वरः। नमो ब्रह्मन् जगत्स्रष्टस्तदुद्भव नमोऽस्तु ते।। सर्वाजित जगज्जेतर्जीवजीव मनोहर। रतिस्वामिन् रतिप्रिय नमोऽस्तु ते।। शश्वद्योषिदधिष्ठान योषित्प्राणाधिकप्रिय। योषिद्वाहन योषास्त्र योषिद्बन्धो नमोऽस्तु ते।। पतिसाध्यकराशेषरूपाधार गुणाश्रय। सुगन्धिवातसचिव मधुमित्र नमोऽस्तु ते।। शश्वद्योनिकृताधार स्त्रीसन्दर्शनवर्धन। विदग्धानां विरहिणां प्राणान्तक नमोऽस्तु ते।। अकृपा येषु तेऽनर्थं तेषां ज्ञानं विनाशनम्। अनूहरूपभक्तेषु कृपासिन्धो नमोऽस्तु ते।। तपस्विनां च तपसां विघ्नबीजाय लीलया। मनः सकामं मुक्तानां कर्तुं शक्तं नमोऽस्तु ते।। तपःसाध्यस्तथाऽऽराध्यः सदैवं पाञ्चभौतिकः। पञ्चेन्द्रियकृताधार पञ्चबाण नमोऽस्तु ते।। मोहिनीत्येवमुक्त्वा तु मनसा सा विधेः पुरः। विरराम नम्रवक्त्रा बभूव ध्यानतत्परा।। उक्तं माध्यन्दिने कान्ते स्तोत्रमेतन्मनोहरम्। पुरा दुर्वाससा दत्तं मोहिन्यै गन्धमादने।। स्तोत्रमेतन्महापुण्

विष्णु पूजा स्तोत्र || श्री विष्णु पूजा स्तोत्रम् ||

 ।। श्रीविष्णुपूजास्तोत्रम् ।। शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।। आराधयामि मणिसन्निभमात्मविष्णुं मायापुरे हृदयपङ्कजसन्निविष्टम्। श्रद्धानदीविमलचित्तजलाभिषिक्तं नित्यं समाधिकुसुमैरपुनर्भवाय।। ज्योतिश्शान्तं सर्वलोकान्तरस्थमोङ्कारारव्यं योगिहृद्ध्यानगम्यम्। साङ्गं शक्तिं सायुधं भक्तसेव्यं सर्वाकारं विष्णुमावाहयामि।। कल्पद्रुमे मणिवेदिमध्ये सिंहासने स्वर्णमयं सरत्नम्। विचित्रवस्त्रावृतमच्युत प्रभो गहाण लक्ष्मीधरणीसमन्वित।। पादोदकं ते परिकल्पयामि पुण्यं सरित्सागरतोयनीतम्। पाद्यं प्रदास्ये सुमनस्समेतं गृहाण लक्ष्मीधरणीसमन्वित।। ब्रह्मेन्द्ररुद्राग्निमुनीन्द्रसेव्यपादारविन्दाम्बुदसन्निभाङ्ग। अर्ध्यं गृहाणाश्रितपारिजात श्रिया सहाम्भोजदलायताक्ष।। तीर्थोदकं गाङ्गमिदं हि विष्णो त्रिविक्रमानन्त मया निवेदितम्। दध्याज्ययुक्तं मधुपर्कसंज्ञं गृहाण देवेश यथाक्रमेण।। आकल्पसंशोभितदिव्यगात्र राकेन्दुनीकाशमुखारविन्द। दत्तं मया चाचमनं गृहाण श्रीकेशवानन्त धरारिदारिन्।। तीर्थोदकैः क

बजरंग बाण का पाठ || bajrang ban ||

 ।। अद्भुत चमत्कारी बजरंग-बाण ।।   “बजरंग बाण” में पूरी श्रद्धा रखने और निष्ठापूर्वक उसके बार-बार दुहराने से हमारे मन में हनुमानजी की शक्तियां ज़मने लगती हैं। शक्ति के विचारों को मन में रमण करने से शरीर में वही शक्तियां बढ़ती हैं। शुभ विचारों को मन में जमाने से मनुष्य की भलाई की शक्तियों में वृद्धि होने लगती है, उसका सत् चित् आनंदस्वरूप खिलता जाता है, मामूली कष्टों और संकटों के निरोध की शक्तियां विकसित हो जाती हैं तथा साहस और निर्भीकता आ जाती है। इस प्रकार बजरंग-बाण में विश्वास रखने और उसे काम में लेने से कोई भी कायर मनुष्य निर्भय और शक्तिशाली बन सकता है। बजरंग-बाण के श्रद्धापूर्वक उच्चारण कर लेने से जो मनुष्य शक्ति के पुंज महावर हनुमानजी को स्थायी रूप से अपने मन में धारण कर लेता है, उसके सब संकट अल्पकाल में ही दूर हो जाते हैं। साधक को चाहिए कि वह अपने सामने श्रीहनुमान जी की मूर्ति या उनका कोई चित्र रख ले और पूरे आत्मविश्वास और निष्ठाभाव से उनका मानसिक ध्यान करे। मन में ऐसी धारणा करे कि हनुमानजी की दिव्य शक्तियां धीरे धीरे मेरे अंदर प्रवेश कर रही हैं। मेरे अंतर तथा चारों ओर के वाय

पार्वतीवल्लभ नीलकण्ठाष्टकम्

 ।। पार्वतीवल्लभनीलकण्ठाष्टकम् ।।  नमो भूतनाथं नमो देवदेवं     नमः कालकालं नमो दिव्यतेजम्। नमः कामभस्मं नमश्शान्तशीलं     भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम्।। सदा तीर्थसिद्धं सदा भक्तरक्षं     सदा शैवपूज्यं सदा शुभ्रभस्मम्। सदा ध्यानयुक्तं सदा ज्ञानतल्पं     भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम्।। श्मशाने शयानं महास्थानवासं     शरीरं गजानं सदा चर्मवेष्टम्। पिशाचं निशोचं पशूनां प्रतिष्ठं     भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम्।। फणीनाग कण्ठे भुजङ्गाद्यनेकं     गले रुण्डमालं महावीर शूरम्। कटिं व्याघ्रचर्मं चिताभस्मलेपं     भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम्।। शिरश्शुद्धगङ्गा शिवा वामभागं     बृहद्दिव्यकेशं सदा मां त्रिनेत्रम्। फणी नागकर्णं सदा भालचन्द्रं     भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम्।। करे शूलधारं महाकष्टनाशं     सुरेशं वरेशं महेशं जनेशम्। धनेशस्तुतेशं ध्वजेशं गिरीशं     भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम्।। उदानं सुदासं सुकैलासवासं     धरा निर्धरं संस्थितं ह्यादिदेवम्। अजा हेमकल्पद्रुमं कल्पसेव्यं     भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम्।। मुनीनां वरेण्यं गुणं रूपवर्णं     द्विजानं पठन्तं शिवं वेदशास्त्रम्। अहो दीनवत्सं कृपालुं शिवं

श्रीराम दुर्गस्तोत्रम्

 ।। अथ श्रीरामदुर्गस्तोत्रम् ।। ॐ अस्य श्रीरामदुर्गस्तोत्रमन्त्रस्य कौशिकऋषिरनुष्टुप्छन्दः श्रीरामो देवता रां बीजं नमः शक्ति। रामाय कीलकम् श्रीरामप्रसादसिद्धिद्वारा मम सर्वतो रक्षापूर्वकनानाप्रयोगसिध्यर्थे श्रीरामदुर्गमन्त्रस्य पाठे विनियोगः। ॐ ऐं क्लीं ह्रीं रीं चों ह्रीं रीं चों ह्रीं श्रीं आं क्रौं ॐ नमोभगवते रामाय मम सर्वाभीष्टं साधय साधय फट् स्वाहा।। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीं ॐ रामाय नमः।। ॐ नमो भगवते रामाय मम प्राच्यां ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल निर्धनं सधनं साधय साधय मां रक्ष रक्ष सर्वदुष्टेभ्यो हूं फट् स्वाहा।। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ॐ लं लक्ष्मणाय नमः। ॐ नमो भगवते लक्ष्मणाय मम याम्यां ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल मां रक्ष रक्ष सर्वदुष्टेभ्यो हूं फट् स्वाहा।। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीं ॐ भं भरताय नमः। ॐ नमो भगवते भरताय मम प्रतीच्यां ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल निर्धनं सधनं साधय साधय मां रक्ष रक्ष सर्वदुष्टेभ्यो हूं फट् स्वाहा।। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीं ॐ शं शत्रुघ्नाय नमः। ॐ नमो भगवते शत्रुघ्नाय मम उदीच्यां ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल निर्धनं सधनं साधय साधय मां रक्ष रक्ष सर्वदुष्टेभ्यो हूं फट् स्वाहा

अक्षमाला स्तुतिः || Akshmala stuti ||

 ।। अक्षमाला स्तुतिः ।। श्रीगायत्रीं त्रयीं विद्यां प्रणम्य परमेश्वरीम्। "अक्षमाला-स्तुतिं'' दिव्यां करोमि सुखदां सताम्।। अथाऽव्यक्ताऽऽदिशक्तिर्या महादेवीन्दिरेश्वरीम्। उमोर्ध्वकेशी ऋग्वेदा "ऋ'' रूपा ऋद्धिदायिनी।। ऌप्तधर्माऽस्ति "ऌ'' नाम्नी त्वेकाक्षरविहारिणी। ऐन्द्री ह्योङ्काररूपा या चौपासनफलप्रदा।। अण्डमध्यस्थिता देवी "अ'' कारमनुरूपिणी। षोडशीं लोकपूज्यां तां सर्वदा संस्मराम्यहम्।। ततो व्यञ्जनवर्णस्थां कमलां खगवाहनाम्। गङ्गां च धर्मदां देवीं "ङ'' क्षरां प्रणमाम्यहम्।। चण्डिकां सततं वन्दे देवीं छन्दोऽनुगां पराम्। जयन्तीं क्षणनिर्घोषां "ञ'' रूप-वृषवाहनाम्।। टङ्कवर्णान्वितां दिव्यां "ठ-ठ" शब्द-निनादिनीम्। डमरूभूषणां देवीं ढक्काहस्तां नमाम्यहम्।। "ण'' वर्णरूपिणीं दिव्यां तप्तकाञ्चनभूषणाम्। थावरां सततं वन्दे दण्डकारण्यवासिनीम्!।। धर्मशीलां नदीरूपां परब्रह्मात्मिकां तथा। फलदां बहुनेत्रां च भवानीं प्रणतोऽस्म्यहम्।। मालिनी तां महामायां पञ्चविंशतिवर्णिकाम्। नत्वा पुनः स्मराम्यत्र यक्षवर्णात्मिक

अम्बिका स्तुतिः. || ambika stuti ||

 ।। अम्बिकास्तुतिः ।। ॐ महातीर्थरैवतगिरिमण्डने जैनमार्गस्थिते विघ्नभीखण्डने!। नेमिनाथाङ्घ्रिराजीवसेवापरे त्वं जयाम्बे जगञ्जन्तुरक्षाकरे !।। ह्रीं महामन्त्ररूपे शिवे  शङ्करे देवि वाचालसत्किङ्किणीनूपुरे!। तारहारावलीराजितोरःस्थले  कर्णताडङ्करुचिरम्यगण्डस्थले!।। अम्बिके ह्राँ स्फुरद्वीजविद्ये स्वयं ह्रीं समागच्छ  मे देहि दुःखक्षयम्। ह्रां ह्रूँ तं द्रावय द्रावयोपद्रवान् ह्रीं द्रुहि क्षुद्रसर्पेभकण्ठीरवान्।। क्लीँ प्रचण्डे प्रसीद प्रसीद क्षणं ब्लूँ सदा प्रसन्ने विधेहीक्षणम्। सः सतां दत्तकल्याणमालोदये ह्स्क्ल्ह्रीं नमस्तेऽम्बिके! अङ्कस्थपुत्रद्वये।। इत्थमद्भूतमाहात्म्यमन्त्रस्तुते क्रोँसमालीढषट्कोणयन्त्रस्थिते!। ह्रींयुतेऽम्बे  मरुन्मण्डलालङ्कृते देहि मे दर्शन ह्रीं त्रिरेखवृते!।। नाशिताशेषमिथ्यादृशां दुर्मदे!  शान्तिकीर्तिद्युतिस्वस्तिसिद्धिप्रदे। दुष्टविद्याबलोच्छेदनप्रत्यले! नन्द नन्दाम्बिके! निश्चले! निर्मले!।। देवि! कूष्माण्डि! दिव्यांशुके! भैरव! दुःसहे दुर्जये!  तप्तहेमच्छवे!। नाममन्त्रेण निर्नाशितोपद्रवे!  पाहि मामंहिपीठस्थकण्ठीरवे!।। देवदेवीगणैः सेविताङ्घ्रिद्वये जागरूकप्रभावैकलक्ष्

श्रीराम रक्षा स्तोत्र पाठ हिंदी अर्थ सहित

 श्रीरामरक्षा स्तोत्र पाठ   श्रीरामरक्षा स्तोत्र सभी तरह की विपत्तियों से व्यक्ति की रक्षा करता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से मनुष्य भय रहित हो जाता है। एक कथा है कि भगवान शंकर ने बुधकौशिक ऋषि को स्वप्न में दर्शन देकर, उन्हें रामरक्षास्तोत्र सुनाया और प्रातःकाल उठने पर उन्होंने वह लिख लिया। यह स्तोत्र संस्कृत भाषा में है। इस स्तोत्र के नित्य पाठ से घर के कष्ट  व भूतबाधा भी दूर होती है। जो इस स्तोत्र का पाठ करता है वह दीर्घायु, सुखी, संततिवान, विजयी तथा विनयसंपन्न होता है। रामरक्षा स्तोत्र का नियमित एक  पाठ करने से शरीर रक्षा होती है। मंगल का कुप्रभाव समाप्त होता है। रामरक्षा स्तोत्र के प्रभाव से व्यक्ति के चारों और एक सुरक्षा कवच बन जाता है जिससे हर प्रकार की विपत्ति से रक्षा होती है। यदि गर्भवती स्त्री रोजाना इस स्तोत्र का पाठ करे तो इसके शुभ प्रभाव से गर्भ रक्षा होती है।  स्वस्थ, सौभाग्यशाली एवं आज्ञाकारी संतान प्राप्त होती है। रामरक्षा स्तोत्र पाठ से भगवान राम के साथ पवनपुत्र हनुमान भी प्रसन्न होते हैं। सर्पप्रथम हाथ में जल लेकर विनियोग मंत्र बोलें- विनियोग अस्य श्री रामरक्षा