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मोहिनी रचित कृष्ण स्तोत्र || मोहिनीरचितम् श्रीकृष्ण स्तोत्रम् ||

 ।। मोहिनीरचितम् श्रीकृष्ण स्तोत्रम् ।।


श्री गणेशाय नमः।


मोहिन्युवाच।

सर्वेन्द्रियाणां प्रवरं विष्णोरंशं च मानसम्।

तदेव कर्मणां बीजं तदुद्भव नमोऽस्तु ते।।


स्वयमात्मा हि भगवान् ज्ञानरूपो महेश्वरः।

नमो ब्रह्मन् जगत्स्रष्टस्तदुद्भव नमोऽस्तु ते।।


सर्वाजित जगज्जेतर्जीवजीव मनोहर।

रतिस्वामिन् रतिप्रिय नमोऽस्तु ते।।


शश्वद्योषिदधिष्ठान योषित्प्राणाधिकप्रिय।

योषिद्वाहन योषास्त्र योषिद्बन्धो नमोऽस्तु ते।।


पतिसाध्यकराशेषरूपाधार गुणाश्रय।

सुगन्धिवातसचिव मधुमित्र नमोऽस्तु ते।।


शश्वद्योनिकृताधार स्त्रीसन्दर्शनवर्धन।

विदग्धानां विरहिणां प्राणान्तक नमोऽस्तु ते।।


अकृपा येषु तेऽनर्थं तेषां ज्ञानं विनाशनम्।

अनूहरूपभक्तेषु कृपासिन्धो नमोऽस्तु ते।।


तपस्विनां च तपसां विघ्नबीजाय लीलया।

मनः सकामं मुक्तानां कर्तुं शक्तं नमोऽस्तु ते।।


तपःसाध्यस्तथाऽऽराध्यः सदैवं पाञ्चभौतिकः।

पञ्चेन्द्रियकृताधार पञ्चबाण नमोऽस्तु ते।।


मोहिनीत्येवमुक्त्वा तु मनसा सा विधेः पुरः।

विरराम नम्रवक्त्रा बभूव ध्यानतत्परा।।


उक्तं माध्यन्दिने कान्ते स्तोत्रमेतन्मनोहरम्।

पुरा दुर्वाससा दत्तं मोहिन्यै गन्धमादने।।


स्तोत्रमेतन्महापुण्यं कामी भक्त्या यदा पठेत्।

अभीष्टं लभते नूनं निष्कलङ्को भवेद् ध्रुवम्।।


चेष्टां न कुरुते कामः कदाचिदपि तं प्रियम्।

भवेदरोगी श्रीयुक्तः कामदेवसमप्रभः।

वनितां लभते साध्वीं पत्नीं त्रैलोक्यमोहिनीम्।।


।। इति श्रीमोहिनीकृतं कृष्णस्तोत्रं समाप्तम् ।।

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