शिव विवाह की कथा|| shiv viwah ki katha || शिव विवाह 1 शिव विवाह 2 देवताओं ने ब्रह्मा जी से कहा की आपने ऐसा वरदान क्यों दिया ? ब्रह्मा जी ने कहा तरका सुर के तप से सारी सृष्टि जल रही थी उसको बचने के लिये मैंने ऐसा वर दिया था। तरका सुर ने सात दिनों के शिशु द्वारा अपनी मत्यु माँगी है, जो तेजस्वी के वीर्य से उत्पन्न हो। शिवजी के वीर्य में ऐसा तेज है, शिव जी के पुत्र द्वारा तारका का वध होगा,और वही तुम्हारा सेनापति भी होगा।अतः हम सभी प्रयास करें कि शिवजी जी समाधी से बाहर आये और पार्वती से विवाह करें। सतीं जो तजी दच्छ मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल गेहा॥ तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी॥ श्री ब्रह्मा जी ने सभी देवताओं से कहा सतीजी ने जो दक्ष के यज्ञ में देह का त्याग किया था, उन्होंने अब हिमाचल के घर पार्वती रूप में जन्म लिया है पार्वती जी ने शिवजी को पति बनाने के लिए कठोर तप किया है, पर महराज शिवजी तो सब कुछ छोड़-कर समाधि लगा ली। इस कार्य में एक बहुत बड़ी समस्या है पहली शिव जी का समाधि से बाहर आना बहुत ही मुश्किल...
भगवान श्रीगणेश सभी जगहों पर अग्रपूजा के अधिकारी हैं. किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत श्रीगणेश की पूजा के साथ ही करने का विधान है. श्री गणेश की पूजा से धन धान्य और समस्त सुखों की प्राप्ति होती है. इसी प्रकार शास्त्रों में श्रीगणेश कवच का उल्लेख आता है. गणेश कवच को सिद्ध कर लेने मात्र से मनुष्य मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कर सकता है. शनैश्चरदेप के विनयपूर्ण आग्रह के बा भगवान श्रीविष्णु ने उन्हें गणेश कवच की दीक्षा दी. भगवान श्रीविष्णु ने कहा - दस लाख जप करने के बाद गणेश कवच सिद्ध हो जाता है. कवच सिद्ध कर लेने पर मनुष्य मृत्यु पर भी विजय प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है. यह सिद्ध कवच धारण करने पर मनुष्य वाग्मी, चिरजीवी, सर्वत्र विजयी और पूज्य हो जाता है. इस मालामंत्र और कवच के प्रभाव से मनुष्य के सारे पातकोप पातक ध्वस्त हो जाते हैं. इस कवच के शब्द श्रवण मात्र से ही भूत-प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, डाकिनी, योगिनी, वेताल आदि बालग्रह, ग्रह तथा क्षेत्रपाल आदि दूर भाग जाते हैं. कवचधारी पुरुष को आधि (मानसिक रोग), व्याधि ( शारीरिक रोग), और भयप्रद शोक स्पर्श नहीं कर पाते. इस प्रकार...