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मारुती स्तोत्रम् || Maaruti stotram ||

 ।। मारुतिस्तोत्रम् ।। ॐ नमो वायुपुत्राय भीमरूपाय धीमते। नमस्ते रामदूताय कामरूपाय श्रीमते।। मोहशोकविनाशाय सीताशोकविनाशिने। भग्नाशोकवनायास्तु दग्धलङ्काय वाग्मिने।। गतिनिर्जितवाताय लक्ष्मणप्राणदाय च। वनौकसां वरिष्ठाय वशिने वनवासिने।। तत्त्वज्ञानसुधासिन्धुनिमग्नाय महीयसे। आञ्जनेयाय शूराय सुग्रीवसचिवाय ते।। जन्ममृत्युभयघ्नाय सर्वक्लेशहराय च। नेदिष्ठाय प्रेतभूतपिशाचभयहारिणे।। यातनानाशनायास्तु नमो मर्कटरूपिणे। यक्षराक्षसशार्दूलसर्पवृश्चिकभीहृते।। महाबलाय वीराय चिरञ्जीविन उद्धते। हारिणे वज्रदेहाय चोल्लङ्घितमहाब्धये।। बलिनामग्रगण्याय नमो नमः पाहि मारुते। लाभदोऽसि त्वमेवाशु हनुमन् राक्षसान्तक। यशो जयं च मे देहि शत्रून्नाशय नाशय।। सङ्गीतेन वशीकरोति वरदं क्ष्माजाधवं राघवं यश्चामीकरचारुगात्रसुषमां विस्तारयत्यद्भुताम्। नानातालकलाकलापनिपुणः कौशन्यवद्गायति स प्रीणातु प्रशस्तगानरसिकव्यामोदिशाखामृगः।। दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा। पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम्।। मारुतिं वीरवज्राङ्गं भक्तरक्षणदीक्षितम्। हनुमन्तं सदा वन्दे राममन्त्रप्रचारकम्।। हनुमन्नञ्जनासूनो वायुपुत्र महाबल। अकस्मादा
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गणेश चालीसा पाठ || Ganesh chalisa ||

 ।। श्री गणेश चालीसा ।। जय गणपति सद्गुण सदन कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण जय जय गिरिजालाल।। जय जय जय गणपति राजू।  मंगल भरण करण शुभ काजू।। जय गजबदन सदन सुखदाता।  विश्व विनायक बुद्धि विधाता।। वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन।। राजित मणि मुक्तन उर माला।  स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला।। पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।  मोदक भोग सुगन्धित फूलं।। सुन्दर पीताम्बर तन साजित।  चरण पादुका मुनि मन राजित।। धनि शिवसुवन षडानन भ्राता।  गौरी ललन विश्व-विधाता।। ऋद्धि सिद्धि तव चँवर डुलावे।  मूषक वाहन सोहत द्वारे।। कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी।  अति शुचि पावन मंगल कारी।। एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी।। भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरि द्विज रूपा।। अतिथि जानि कै गौरी सुखारी।  बहु विधि सेवा करी तुम्हारी।। अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा।  मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा।। मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला।  बिना गर्भ धारण यहि काला।। गणनायक गुण ज्ञान निधाना।  पूजित प्रथम रूप भगवाना।। अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै।  पलना पर बालक स्वरूप ह्वै।। बनि शिशु रुदन जबहि तुम ठाना

शिव विवाह की कथा || शिवपार्वती विवाह कथा ||

  शिवपार्वती विवाह कथा  सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा।। तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई।। भावार्थ- सती ने मरते समय भगवान हरि से यह वर माँगा कि मेरा जन्म-जन्म में शिवजी के चरणों में अनुराग रहे। इसी कारण उन्होंने हिमाचल के घर जाकर पार्वती के शरीर से जन्म लिया। सती के विरह में शंकरजी की दयनीय दशा हो गई। वे हर पल सती का ही ध्यान करते रहते और उन्हीं की चर्चा में व्यस्त रहते। उधर सती ने भी शरीर का त्याग करते समय संकल्प किया था कि मैं राजा हिमालय के यहाँ जन्म लेकर शंकरजी की अर्द्धांगिनी बनूँ। अब जगदम्बा का संकल्प व्यर्थ होने से तो रहा। वे उचित समय पर राजा हिमालय की पत्नी मेनका के गर्भ में प्रविष्ट होकर उनकी कोख में से प्रकट हुईं। पर्वतराज की पुत्री होने के कारण वे 'पार्वती' कहलाईं। जब पार्वती बड़ी होकर सयानी हुईं तो उनके माता-पिता को अच्छा वर तलाश करने की चिंता सताने लगी। एक दिन अचानक देवर्षि नारद राजा हिमालय के महल में आ पहुँचे और पार्वती को देख कहने लगे कि इसका विवाह शंकरजी के साथ होना चाहिए और वे ही सभी दृष्टि से इसके योग्य हैं। पार्वती के माता-पि

वेदसार शिवस्तव: || Vedsar shivstav ||

 वेदसार शिवस्तव: पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम् जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम् ॥१॥ महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम् विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम् ॥२॥ गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम् भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गंभवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम् ॥३॥ शिवाकान्त शंभो शशाङ्कार्धमौले महेशान शूलिञ्जटाजूटधारिन् त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूपः प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप ॥४॥ परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं निरीहं निराकारमोंकारवेद्यम् यतो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम् ॥५॥ न भूमिर्नं चापो न वह्निर्न वायु- र्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा न गृष्मो न शीतं न देशो न वेषो न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीडे ॥६॥ अजं शाश्वतं कारणं कारणानां शिवं केवलं भासकं भासकानाम् तुरीयं तमःपारमाद्यन्तहीनं प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम् ॥७॥ नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य ॥८॥ प्रभ

शिव नामावली अष्टक || Shivashtak ||

 ।। भगवान शिव का नामावली अष्टक ।। संसार में ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है, जो स्तुति से प्रसन्न न हो जाता हो। भगवान शिव आशुतोष (शीघ्र ही प्रसन्न होने वाले) हैं। अत: यदि उनके विभिन्न नामों के साथ उनकी आराधना की जाए तो वे शीघ्र ही प्रसन्न होकर आराधक को सांसारिक पीड़ाओं से मुक्त कर मनवांछित वस्तु प्रदान कर देते हैं। भगवान शिव का नामावल्यष्टक (नामावली का अष्टक) श्रीशंकराचार्यजी द्वारा रचित एक ऐसा ही सुन्दर स्तोत्र है जिसके आठ पदों में भगवान शिव के विभिन्न नामों का गान कर सांसारिक दु:खों से रक्षा की प्रार्थना की गई है और नवें पद में उन्हें वंदन किया गया है। श्रद्धा भक्ति से किए गए इस स्तोत्र के नित्य पाठ से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होकर आराधक का कल्याण कर देते हैं। सांसारिक दु:खों से मुक्ति के लिए भगवान शिव का नामावली- ।। शिवनामावल्यष्टकम् ।। हे चन्द्रचूड मदनान्तक शूलपाणे स्थाणो गिरीश गिरिजेश महेश शम्भो। भूतेश भीतभयसूदन मामनाथं संसारदु:खगहनाज्जगदीश रक्ष।। हे चन्द्रचूड! (चन्द्रमा को सिर पर धारण करने वाले), हे मदनान्तक! (कामदेव को भस्म कर देने वाले), हे शूलपाणे! हे स्थाणो! (सदा स्थिर रहने वाले), ह

खजूर के फायदे, औषधीय गुण || Health benefits of dates ||

 खजूर के औषधीय गुण छुहारा और खजूर एक ही पेड़ की देन है। इन दोनों की तासीर गर्म होती है और ये दोनों शरीर को स्वस्थ रखने, मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। गर्म तासीर होने के कारण सर्दियों में तो इसकी उपयोगिता और बढ़ जाती है। आइए, इस बार जानें छुहारा और खजूर के फायदे के बारे में- 1. खजूर में छुहारे से ज्यादा पौष्टिकता होती है। खजूर मिलता भी सर्दी में ही है। अगर पाचन शक्ति अच्छी हो तो खजूर खाना ज्यादा फायदेमंद है। छुहारे का सेवन तो सालभर किया जा सकता है, क्योंकि यह सूखा फल बाजार में सालभर मिलता है।  2.छुहारा यानी सूखा हुआ खजूर आमाशय को बल प्रदान करता है।  3. छुहारे की तासीर गर्म होने से ठंड के दिनों में इसका सेवन नाड़ी के दर्द में भी आराम देता है।  4.छुहारा खुश्क फलों में गिना जाता है, जिसके प्रयोग से शरीर हृष्ट-पुष्ट बनता है। शरीर को शक्ति देने के लिए मेवों के साथ छुहारे का प्रयोग खासतौर पर किया जाता है।  5. छुहारे व खजूर दिल को शक्ति प्रदान करते हैं। यह शरीर में रक्त वृद्धि करते हैं।  6.साइटिका रोग से पीड़ित लोगों को इससे विशेष लाभ होता है।  7.खजूर के सेवन से दमे के रोगिय

मोहिनी रचित कृष्ण स्तोत्र || मोहिनीरचितम् श्रीकृष्ण स्तोत्रम् ||

 ।। मोहिनीरचितम् श्रीकृष्ण स्तोत्रम् ।। श्री गणेशाय नमः। मोहिन्युवाच। सर्वेन्द्रियाणां प्रवरं विष्णोरंशं च मानसम्। तदेव कर्मणां बीजं तदुद्भव नमोऽस्तु ते।। स्वयमात्मा हि भगवान् ज्ञानरूपो महेश्वरः। नमो ब्रह्मन् जगत्स्रष्टस्तदुद्भव नमोऽस्तु ते।। सर्वाजित जगज्जेतर्जीवजीव मनोहर। रतिस्वामिन् रतिप्रिय नमोऽस्तु ते।। शश्वद्योषिदधिष्ठान योषित्प्राणाधिकप्रिय। योषिद्वाहन योषास्त्र योषिद्बन्धो नमोऽस्तु ते।। पतिसाध्यकराशेषरूपाधार गुणाश्रय। सुगन्धिवातसचिव मधुमित्र नमोऽस्तु ते।। शश्वद्योनिकृताधार स्त्रीसन्दर्शनवर्धन। विदग्धानां विरहिणां प्राणान्तक नमोऽस्तु ते।। अकृपा येषु तेऽनर्थं तेषां ज्ञानं विनाशनम्। अनूहरूपभक्तेषु कृपासिन्धो नमोऽस्तु ते।। तपस्विनां च तपसां विघ्नबीजाय लीलया। मनः सकामं मुक्तानां कर्तुं शक्तं नमोऽस्तु ते।। तपःसाध्यस्तथाऽऽराध्यः सदैवं पाञ्चभौतिकः। पञ्चेन्द्रियकृताधार पञ्चबाण नमोऽस्तु ते।। मोहिनीत्येवमुक्त्वा तु मनसा सा विधेः पुरः। विरराम नम्रवक्त्रा बभूव ध्यानतत्परा।। उक्तं माध्यन्दिने कान्ते स्तोत्रमेतन्मनोहरम्। पुरा दुर्वाससा दत्तं मोहिन्यै गन्धमादने।। स्तोत्रमेतन्महापुण्यं कामी